- सूरह संख्या
- 79
- आयतें
- 46
- अवतरण
- मक्की
- पारा
- 30
- मुसहफ़ के पृष्ठ
- 583-584
सुनें · Mishary Rashid Alafasy
بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَٰنِ ٱلرَّحِيمِ
وَٱلنَّٰزِعَٰتِ غَرْقًۭا ﴿١﴾
1उन (फ़रिश्तों) की क़सम
وَٱلنَّٰشِطَٰتِ نَشْطًۭا ﴿٢﴾
2जो (कुफ्फ़ार की रूह) डूब कर सख्ती से खींच लेते हैं
وَٱلسَّٰبِحَٰتِ سَبْحًۭا ﴿٣﴾
3और उनकी क़सम जो (मोमिनीन की जान) आसानी से खोल देते हैं
فَٱلسَّٰبِقَٰتِ سَبْقًۭا ﴿٤﴾
4और उनकी क़सम जो (आसमान ज़मीन के दरमियान) पैरते फिरते हैं
فَٱلْمُدَبِّرَٰتِ أَمْرًۭا ﴿٥﴾
5फिर एक के आगे बढ़ते हैं
يَوْمَ تَرْجُفُ ٱلرَّاجِفَةُ ﴿٦﴾
6फिर (दुनिया के) इन्तज़ाम करते हैं (उनकी क़सम) कि क़यामत हो कर रहेगी
تَتْبَعُهَا ٱلرَّادِفَةُ ﴿٧﴾
7जिस दिन ज़मीन को भूचाल आएगा फिर उसके पीछे और ज़लज़ला आएगा
قُلُوبٌۭ يَوْمَئِذٍۢ وَاجِفَةٌ ﴿٨﴾
8उस दिन दिलों को धड़कन होगी
أَبْصَٰرُهَا خَٰشِعَةٌۭ ﴿٩﴾
9उनकी ऑंखें (निदामत से) झुकी हुई होंगी
يَقُولُونَ أَءِنَّا لَمَرْدُودُونَ فِى ٱلْحَافِرَةِ ﴿١٠﴾
10कुफ्फ़ार कहते हैं कि क्या हम उलटे पाँव (ज़िन्दगी की तरफ़) फिर लौटेंगे
أَءِذَا كُنَّا عِظَٰمًۭا نَّخِرَةًۭ ﴿١١﴾
11क्या जब हम खोखल हड्डियाँ हो जाएँगे
قَالُوا۟ تِلْكَ إِذًۭا كَرَّةٌ خَاسِرَةٌۭ ﴿١٢﴾
12कहते हैं कि ये लौटना तो बड़ा नुक़सान देह है
فَإِنَّمَا هِىَ زَجْرَةٌۭ وَٰحِدَةٌۭ ﴿١٣﴾
13वह (क़यामत) तो (गोया) बस एक सख्त चीख़ होगी
فَإِذَا هُم بِٱلسَّاهِرَةِ ﴿١٤﴾
14और लोग शक़ बारगी एक मैदान (हश्र) में मौजूद होंगे
هَلْ أَتَىٰكَ حَدِيثُ مُوسَىٰٓ ﴿١٥﴾
15(ऐ रसूल) क्या तुम्हारे पास मूसा का किस्सा भी पहुँचा है
إِذْ نَادَىٰهُ رَبُّهُۥ بِٱلْوَادِ ٱلْمُقَدَّسِ طُوًى ﴿١٦﴾
16जब उनको परवरदिगार ने तूवा के मैदान में पुकारा
ٱذْهَبْ إِلَىٰ فِرْعَوْنَ إِنَّهُۥ طَغَىٰ ﴿١٧﴾
17कि फिरऔन के पास जाओ वह सरकश हो गया है
فَقُلْ هَل لَّكَ إِلَىٰٓ أَن تَزَكَّىٰ ﴿١٨﴾
18(और उससे) कहो कि क्या तेरी ख्वाहिश है कि (कुफ्र से) पाक हो जाए
وَأَهْدِيَكَ إِلَىٰ رَبِّكَ فَتَخْشَىٰ ﴿١٩﴾
19और मैं तुझे तेरे परवरदिगार की राह बता दूँ तो तुझको ख़ौफ (पैदा) हो
فَأَرَىٰهُ ٱلْءَايَةَ ٱلْكُبْرَىٰ ﴿٢٠﴾
20ग़रज़ मूसा ने उसे (असा का बड़ा) मौजिज़ा दिखाया
فَكَذَّبَ وَعَصَىٰ ﴿٢١﴾
21तो उसने झुठला दिया और न माना
ثُمَّ أَدْبَرَ يَسْعَىٰ ﴿٢٢﴾
22फिर पीठ फेर कर (ख़िलाफ़ की) तदबीर करने लगा
فَحَشَرَ فَنَادَىٰ ﴿٢٣﴾
23फिर (लोगों को) जमा किया और बुलन्द आवाज़ से चिल्लाया
فَقَالَ أَنَا۠ رَبُّكُمُ ٱلْأَعْلَىٰ ﴿٢٤﴾
24तो कहने लगा मैं तुम लोगों का सबसे बड़ा परवरदिगार हूँ
فَأَخَذَهُ ٱللَّهُ نَكَالَ ٱلْءَاخِرَةِ وَٱلْأُولَىٰٓ ﴿٢٥﴾
25तो ख़ुदा ने उसे दुनिया और आख़ेरत (दोनों) के अज़ाब में गिरफ्तार किया
إِنَّ فِى ذَٰلِكَ لَعِبْرَةًۭ لِّمَن يَخْشَىٰٓ ﴿٢٦﴾
26बेशक जो शख़्श (ख़ुदा से) डरे उसके लिए इस (किस्से) में इबरत है
ءَأَنتُمْ أَشَدُّ خَلْقًا أَمِ ٱلسَّمَآءُ ۚ بَنَىٰهَا ﴿٢٧﴾
27भला तुम्हारा पैदा करना ज्यादा मुश्किल है या आसमान का
رَفَعَ سَمْكَهَا فَسَوَّىٰهَا ﴿٢٨﴾
28कि उसी ने उसको बनाया उसकी छत को ख़ूब ऊँचा रखा
وَأَغْطَشَ لَيْلَهَا وَأَخْرَجَ ضُحَىٰهَا ﴿٢٩﴾
29फिर उसे दुरूस्त किया और उसकी रात को तारीक बनाया और (दिन को) उसकी धूप निकाली
وَٱلْأَرْضَ بَعْدَ ذَٰلِكَ دَحَىٰهَآ ﴿٣٠﴾
30और उसके बाद ज़मीन को फैलाया
أَخْرَجَ مِنْهَا مَآءَهَا وَمَرْعَىٰهَا ﴿٣١﴾
31उसी में से उसका पानी और उसका चारा निकाला
وَٱلْجِبَالَ أَرْسَىٰهَا ﴿٣٢﴾
32और पहाड़ों को उसमें गाड़ दिया
مَتَٰعًۭا لَّكُمْ وَلِأَنْعَٰمِكُمْ ﴿٣٣﴾
33(ये सब सामान) तुम्हारे और तुम्हारे चारपायो के फ़ायदे के लिए है
فَإِذَا جَآءَتِ ٱلطَّآمَّةُ ٱلْكُبْرَىٰ ﴿٣٤﴾
34तो जब बड़ी सख्त मुसीबत (क़यामत) आ मौजूद होगी
يَوْمَ يَتَذَكَّرُ ٱلْإِنسَٰنُ مَا سَعَىٰ ﴿٣٥﴾
35जिस दिन इन्सान अपने कामों को कुछ याद करेगा
وَبُرِّزَتِ ٱلْجَحِيمُ لِمَن يَرَىٰ ﴿٣٦﴾
36और जहन्नुम देखने वालों के सामने ज़ाहिर कर दी जाएगी
فَأَمَّا مَن طَغَىٰ ﴿٣٧﴾
37तो जिसने (दुनिया में) सर उठाया था
وَءَاثَرَ ٱلْحَيَوٰةَ ٱلدُّنْيَا ﴿٣٨﴾
38और दुनियावी ज़िन्दगी को तरजीह दी थी
فَإِنَّ ٱلْجَحِيمَ هِىَ ٱلْمَأْوَىٰ ﴿٣٩﴾
39उसका ठिकाना तो यक़ीनन दोज़ख़ है
وَأَمَّا مَنْ خَافَ مَقَامَ رَبِّهِۦ وَنَهَى ٱلنَّفْسَ عَنِ ٱلْهَوَىٰ ﴿٤٠﴾
40मगर जो शख़्श अपने परवरदिगार के सामने खड़े होने से डरता और जी को नाजायज़ ख्वाहिशों से रोकता रहा
فَإِنَّ ٱلْجَنَّةَ هِىَ ٱلْمَأْوَىٰ ﴿٤١﴾
41तो उसका ठिकाना यक़ीनन बेहश्त है
يَسْـَٔلُونَكَ عَنِ ٱلسَّاعَةِ أَيَّانَ مُرْسَىٰهَا ﴿٤٢﴾
42(ऐ रसूल) लोग तुम से क़यामत के बारे में पूछते हैं
فِيمَ أَنتَ مِن ذِكْرَىٰهَآ ﴿٤٣﴾
43कि उसका कहीं थल बेड़ा भी है
إِلَىٰ رَبِّكَ مُنتَهَىٰهَآ ﴿٤٤﴾
44तो तुम उसके ज़िक्र से किस फ़िक्र में हो
إِنَّمَآ أَنتَ مُنذِرُ مَن يَخْشَىٰهَا ﴿٤٥﴾
45उस (के इल्म) की इन्तेहा तुम्हारे परवरदिगार ही तक है तो तुम बस जो उससे डरे उसको डराने वाले हो
كَأَنَّهُمْ يَوْمَ يَرَوْنَهَا لَمْ يَلْبَثُوٓا۟ إِلَّا عَشِيَّةً أَوْ ضُحَىٰهَا ﴿٤٦﴾
46जिस दिन वह लोग इसको देखेंगे तो (समझेंगे कि दुनिया में) बस एक शाम या सुबह ठहरे थे
क़ुरआन का पाठ: तंज़ील प्रोजेक्ट (tanzil.net), उस्मानी लिपि, हूबहू प्रति, CC BY 3.0। अनुवाद: सुहेल फ़ारूक़ ख़ान और सैफ़ुर्रहमान नदवी।
सूरह An-Nazi'at में कितनी आयतें हैं?
सूरह An-Nazi'at में 46 आयतें हैं।
सूरह An-Nazi'at मक्की है या मदनी?
सूरह An-Nazi'at मक्की सूरह है, मुसहफ़ के क्रम में 79वीं।
सूरह An-Nazi'at किस पारे में है?
सूरह An-Nazi'at पारा 30 में है, मदीना मुसहफ़ के पृष्ठ 583-584 पर।