सूरह Ar-Rahman

سورة الرحمن

क़ुरआन की 114 सूरतों में 55वीं, मदनी, 78 आयतें। उस्मानी लिपि में पूरा अरबी पाठ (हफ़्स अन आसिम) और हिंदी अनुवाद।

#55मदनी78 आयतें
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सूरह संख्या
55
आयतें
78
अवतरण
मदनी
पारा
27
मुसहफ़ के पृष्ठ
531-534

सुनें · Mishary Rashid Alafasy

بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَٰنِ ٱلرَّحِيمِ

ٱلرَّحْمَٰنُ ﴿١﴾

1बड़ा मेहरबान (ख़ुदा)

عَلَّمَ ٱلْقُرْءَانَ ﴿٢﴾

2उसी ने क़ुरान की तालीम फरमाई

خَلَقَ ٱلْإِنسَٰنَ ﴿٣﴾

3उसी ने इन्सान को पैदा किया

عَلَّمَهُ ٱلْبَيَانَ ﴿٤﴾

4उसी ने उनको (अपना मतलब) बयान करना सिखाया

ٱلشَّمْسُ وَٱلْقَمَرُ بِحُسْبَانٍۢ ﴿٥﴾

5सूरज और चाँद एक मुक़र्रर हिसाब से चल रहे हैं

وَٱلنَّجْمُ وَٱلشَّجَرُ يَسْجُدَانِ ﴿٦﴾

6और बूटियाँ बेलें, और दरख्त (उसी को) सजदा करते हैं

وَٱلسَّمَآءَ رَفَعَهَا وَوَضَعَ ٱلْمِيزَانَ ﴿٧﴾

7और उसी ने आसमान बुलन्द किया और तराजू (इन्साफ) को क़ायम किया

أَلَّا تَطْغَوْا۟ فِى ٱلْمِيزَانِ ﴿٨﴾

8ताकि तुम लोग तराज़ू (से तौलने) में हद से तजाउज़ न करो

وَأَقِيمُوا۟ ٱلْوَزْنَ بِٱلْقِسْطِ وَلَا تُخْسِرُوا۟ ٱلْمِيزَانَ ﴿٩﴾

9और ईन्साफ के साथ ठीक तौलो और तौल कम न करो

وَٱلْأَرْضَ وَضَعَهَا لِلْأَنَامِ ﴿١٠﴾

10और उसी ने लोगों के नफे क़े लिए ज़मीन बनायी

فِيهَا فَٰكِهَةٌۭ وَٱلنَّخْلُ ذَاتُ ٱلْأَكْمَامِ ﴿١١﴾

11कि उसमें मेवे और खजूर के दरख्त हैं जिसके ख़ोशों में ग़िलाफ़ होते हैं

وَٱلْحَبُّ ذُو ٱلْعَصْفِ وَٱلرَّيْحَانُ ﴿١٢﴾

12और अनाज जिसके साथ भुस होता है और ख़ुशबूदार फूल

فَبِأَىِّ ءَالَآءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ ﴿١٣﴾

13तो (ऐ गिरोह जिन व इन्स) तुम दोनों अपने परवरदिगार की कौन कौन सी नेअमतों को न मानोगे

خَلَقَ ٱلْإِنسَٰنَ مِن صَلْصَٰلٍۢ كَٱلْفَخَّارِ ﴿١٤﴾

14उसी ने इन्सान को ठीकरे की तरह खन खनाती हुई मिटटी से पैदा किया

وَخَلَقَ ٱلْجَآنَّ مِن مَّارِجٍۢ مِّن نَّارٍۢ ﴿١٥﴾

15और उसी ने जिन्नात को आग के शोले से पैदा किया

فَبِأَىِّ ءَالَآءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ ﴿١٦﴾

16तो (ऐ गिरोह जिन व इन्स) तुम अपने परवरदिगार की कौन कौन सी नेअमतों से मुकरोगे

رَبُّ ٱلْمَشْرِقَيْنِ وَرَبُّ ٱلْمَغْرِبَيْنِ ﴿١٧﴾

17वही जाड़े गर्मी के दोनों मशरिकों का मालिक है और दोनों मग़रिबों का (भी) मालिक है

فَبِأَىِّ ءَالَآءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ ﴿١٨﴾

18तो (ऐ जिनों) और (आदमियों) तुम अपने परवरदिगार की किस किस नेअमत से इन्कार करोगे

مَرَجَ ٱلْبَحْرَيْنِ يَلْتَقِيَانِ ﴿١٩﴾

19उसी ने दरिया बहाए जो बाहम मिल जाते हैं

بَيْنَهُمَا بَرْزَخٌۭ لَّا يَبْغِيَانِ ﴿٢٠﴾

20दो के दरमियान एक हद्दे फ़ासिल (आड़) है जिससे तजाउज़ नहीं कर सकते

فَبِأَىِّ ءَالَآءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ ﴿٢١﴾

21तो (ऐ जिन व इन्स) तुम दोनों अपने परवरदिगार की किस किस नेअमत को झुठलाओगे

يَخْرُجُ مِنْهُمَا ٱللُّؤْلُؤُ وَٱلْمَرْجَانُ ﴿٢٢﴾

22इन दोनों दरियाओं से मोती और मूँगे निकलते हैं

فَبِأَىِّ ءَالَآءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ ﴿٢٣﴾

23(तो जिन व इन्स) तुम दोनों अपने परवरदिगार की कौन कौन सी नेअमत को न मानोगे

وَلَهُ ٱلْجَوَارِ ٱلْمُنشَـَٔاتُ فِى ٱلْبَحْرِ كَٱلْأَعْلَٰمِ ﴿٢٤﴾

24और जहाज़ जो दरिया में पहाड़ों की तरह ऊँचे खड़े रहते हैं उसी के हैं

فَبِأَىِّ ءَالَآءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ ﴿٢٥﴾

25तो (ऐ जिन व इन्स) तुम अपने परवरदिगार की किस किस नेअमत को झुठलाओगे

كُلُّ مَنْ عَلَيْهَا فَانٍۢ ﴿٢٦﴾

26जो (मख़लूक) ज़मीन पर है सब फ़ना होने वाली है

وَيَبْقَىٰ وَجْهُ رَبِّكَ ذُو ٱلْجَلَٰلِ وَٱلْإِكْرَامِ ﴿٢٧﴾

27और सिर्फ तुम्हारे परवरदिगार की ज़ात जो अज़मत और करामत वाली है बाक़ी रहेगी

فَبِأَىِّ ءَالَآءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ ﴿٢٨﴾

28तो तुम दोनों अपने मालिक की किस किस नेअमत से इन्कार करोगे

يَسْـَٔلُهُۥ مَن فِى ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضِ ۚ كُلَّ يَوْمٍ هُوَ فِى شَأْنٍۢ ﴿٢٩﴾

29और जितने लोग सारे आसमान व ज़मीन में हैं (सब) उसी से माँगते हैं वह हर रोज़ (हर वक्त) मख़लूक के एक न एक काम में है

فَبِأَىِّ ءَالَآءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ ﴿٣٠﴾

30तो तुम दोनों अपने सरपरस्त की कौन कौन सी नेअमत से मुकरोगे

سَنَفْرُغُ لَكُمْ أَيُّهَ ٱلثَّقَلَانِ ﴿٣١﴾

31(ऐ दोनों गिरोहों) हम अनक़रीब ही तुम्हारी तरफ मुतावज्जे होंगे

فَبِأَىِّ ءَالَآءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ ﴿٣٢﴾

32तो तुम दोनों अपने पालने वाले की किस किस नेअमत को न मानोगे

يَٰمَعْشَرَ ٱلْجِنِّ وَٱلْإِنسِ إِنِ ٱسْتَطَعْتُمْ أَن تَنفُذُوا۟ مِنْ أَقْطَارِ ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضِ فَٱنفُذُوا۟ ۚ لَا تَنفُذُونَ إِلَّا بِسُلْطَٰنٍۢ ﴿٣٣﴾

33ऐ गिरोह जिन व इन्स अगर तुममें क़ुदरत है कि आसमानों और ज़मीन के किनारों से (होकर कहीं) निकल (कर मौत या अज़ाब से भाग) सको तो निकल जाओ (मगर) तुम तो बग़ैर क़ूवत और ग़लबे के निकल ही नहीं सकते (हालॉ कि तुममें न क़ूवत है और न ही ग़लबा)

فَبِأَىِّ ءَالَآءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ ﴿٣٤﴾

34तो तुम अपने परवरदिगार की किस किस नेअमत को झुठलाओगे

يُرْسَلُ عَلَيْكُمَا شُوَاظٌۭ مِّن نَّارٍۢ وَنُحَاسٌۭ فَلَا تَنتَصِرَانِ ﴿٣٥﴾

35(गुनाहगार जिनों और आदमियों जहन्नुम में) तुम दोनो पर आग का सब्ज़ शोला और सियाह धुऑं छोड़ दिया जाएगा तो तुम दोनों (किस तरह) रोक नहीं सकोगे

فَبِأَىِّ ءَالَآءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ ﴿٣٦﴾

36फिर तुम दोनों अपने परवरदिगार की किस किस नेअमत से इन्कार करोगे

فَإِذَا ٱنشَقَّتِ ٱلسَّمَآءُ فَكَانَتْ وَرْدَةًۭ كَٱلدِّهَانِ ﴿٣٧﴾

37फिर जब आसमान फट कर (क़यामत में) तेल की तरह लाल हो जाऐगा

فَبِأَىِّ ءَالَآءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ ﴿٣٨﴾

38तो तुम दोनों अपने परवरदिगार की किस किस नेअमत से मुकरोगे

فَيَوْمَئِذٍۢ لَّا يُسْـَٔلُ عَن ذَنۢبِهِۦٓ إِنسٌۭ وَلَا جَآنٌّۭ ﴿٣٩﴾

39तो उस दिन न तो किसी इन्सान से उसके गुनाह के बारे में पूछा जाएगा न किसी जिन से

فَبِأَىِّ ءَالَآءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ ﴿٤٠﴾

40तो तुम दोनों अपने मालिक की किस किस नेअमत को न मानोगे

يُعْرَفُ ٱلْمُجْرِمُونَ بِسِيمَٰهُمْ فَيُؤْخَذُ بِٱلنَّوَٰصِى وَٱلْأَقْدَامِ ﴿٤١﴾

41गुनाहगार लोग तो अपने चेहरों ही से पहचान लिए जाएँगे तो पेशानी के पटटे और पाँव पकड़े (जहन्नुम में डाल दिये जाएँगे)

فَبِأَىِّ ءَالَآءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ ﴿٤٢﴾

42आख़िर तुम दोनों अपने परवरदिगार की किस किस नेअमत से इन्कार करोगे

هَٰذِهِۦ جَهَنَّمُ ٱلَّتِى يُكَذِّبُ بِهَا ٱلْمُجْرِمُونَ ﴿٤٣﴾

43(फिर उनसे कहा जाएगा) यही वह जहन्नुम है जिसे गुनाहगार लोग झुठलाया करते थे

يَطُوفُونَ بَيْنَهَا وَبَيْنَ حَمِيمٍ ءَانٍۢ ﴿٤٤﴾

44ये लोग दोज़ख़ और हद दरजा खौलते हुए पानी के दरमियान (बेक़रार दौड़ते) चक्कर लगाते फिरेंगे

فَبِأَىِّ ءَالَآءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ ﴿٤٥﴾

45तो तुम दोनों अपने परवरदिगार की किस किस नेअमत को न मानोगे

وَلِمَنْ خَافَ مَقَامَ رَبِّهِۦ جَنَّتَانِ ﴿٤٦﴾

46और जो शख्स अपने परवरदिगार के सामने खड़े होने से डरता रहा उसके लिए दो दो बाग़ हैं

فَبِأَىِّ ءَالَآءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ ﴿٤٧﴾

47तो तुम दोनों अपने परवरदिगार की कौन कौन सी नेअमत से इन्कार करोगे

ذَوَاتَآ أَفْنَانٍۢ ﴿٤٨﴾

48दोनों बाग़ (दरख्तों की) टहनियों से हरे भरे (मेवों से लदे) हुए

فَبِأَىِّ ءَالَآءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ ﴿٤٩﴾

49फिर दोनों अपने सरपरस्त की किस किस नेअमतों को झुठलाओगे

فِيهِمَا عَيْنَانِ تَجْرِيَانِ ﴿٥٠﴾

50इन दोनों में दो चश्में जारी होंगें

فَبِأَىِّ ءَالَآءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ ﴿٥١﴾

51तो तुम दोनों अपने परवरदिगार की किस किस नेअमत से मुकरोगे

فِيهِمَا مِن كُلِّ فَٰكِهَةٍۢ زَوْجَانِ ﴿٥٢﴾

52इन दोनों बाग़ों में सब मेवे दो दो किस्म के होंगे

فَبِأَىِّ ءَالَآءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ ﴿٥٣﴾

53तुम दोनों अपने परवरदिगार की किस किस नेअमत से इन्कार करोगे

مُتَّكِـِٔينَ عَلَىٰ فُرُشٍۭ بَطَآئِنُهَا مِنْ إِسْتَبْرَقٍۢ ۚ وَجَنَى ٱلْجَنَّتَيْنِ دَانٍۢ ﴿٥٤﴾

54यह लोग उन फ़र्शों पर जिनके असतर अतलस के होंगे तकिये लगाकर बैठे होंगे तो दोनों बाग़ों के मेवे (इस क़दर) क़रीब होंगे (कि अगर चाहे तो लगे हुए खालें)

فَبِأَىِّ ءَالَآءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ ﴿٥٥﴾

55तो तुम दोनों अपने मालिक की किस किस नेअमत को न मानोगे

فِيهِنَّ قَٰصِرَٰتُ ٱلطَّرْفِ لَمْ يَطْمِثْهُنَّ إِنسٌۭ قَبْلَهُمْ وَلَا جَآنٌّۭ ﴿٥٦﴾

56इसमें (पाक दामन ग़ैर की तरफ ऑंख उठा कर न देखने वाली औरतें होंगी जिनको उन से पहले न किसी इन्सान ने हाथ लगाया होगा) और जिन ने

فَبِأَىِّ ءَالَآءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ ﴿٥٧﴾

57तो तुम दोनों अपने परवरदिगार की किन किन नेअमतों को झुठलाओगे

كَأَنَّهُنَّ ٱلْيَاقُوتُ وَٱلْمَرْجَانُ ﴿٥٨﴾

58(ऐसी हसीन) गोया वह (मुजस्सिम) याक़ूत व मूँगे हैं

فَبِأَىِّ ءَالَآءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ ﴿٥٩﴾

59तो तुम दोनों अपने परवरदिगार की किन किन नेअमतों से मुकरोगे

هَلْ جَزَآءُ ٱلْإِحْسَٰنِ إِلَّا ٱلْإِحْسَٰنُ ﴿٦٠﴾

60भला नेकी का बदला नेकी के सिवा कुछ और भी है

فَبِأَىِّ ءَالَآءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ ﴿٦١﴾

61फिर तुम दोनों अपने मालिक की किस किस नेअमत को झुठलाओगे

وَمِن دُونِهِمَا جَنَّتَانِ ﴿٦٢﴾

62उन दोनों बाग़ों के अलावा दो बाग़ और हैं

فَبِأَىِّ ءَالَآءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ ﴿٦٣﴾

63तो तुम दोनों अपने पालने वाले की किस किस नेअमत से इन्कार करोगे

مُدْهَآمَّتَانِ ﴿٦٤﴾

64दोनों निहायत गहरे सब्ज़ व शादाब

فَبِأَىِّ ءَالَآءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ ﴿٦٥﴾

65तो तुम दोनों अपने सरपरस्त की किन किन नेअमतों को न मानोगे

فِيهِمَا عَيْنَانِ نَضَّاخَتَانِ ﴿٦٦﴾

66उन दोनों बाग़ों में दो चश्में जोश मारते होंगे

فَبِأَىِّ ءَالَآءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ ﴿٦٧﴾

67तो तुम दोनों अपने परवरदिगार की किस किस नेअमत से मुकरोगे

فِيهِمَا فَٰكِهَةٌۭ وَنَخْلٌۭ وَرُمَّانٌۭ ﴿٦٨﴾

68उन दोनों में मेवें हैं खुरमें और अनार

فَبِأَىِّ ءَالَآءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ ﴿٦٩﴾

69तो तुम दोनों अपने मालिक की किन किन नेअमतों को झुठलाओगे

فِيهِنَّ خَيْرَٰتٌ حِسَانٌۭ ﴿٧٠﴾

70उन बाग़ों में ख़ुश ख़ुल्क और ख़ूबसूरत औरतें होंगी

فَبِأَىِّ ءَالَآءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ ﴿٧١﴾

71तो तुम दोनों अपने मालिक की किन किन नेअमतों को झुठलाओगे

حُورٌۭ مَّقْصُورَٰتٌۭ فِى ٱلْخِيَامِ ﴿٧٢﴾

72वह हूरें हैं जो ख़ेमों में छुपी बैठी हैं

فَبِأَىِّ ءَالَآءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ ﴿٧٣﴾

73फिर तुम दोनों अपने परवरदिगार की कौन कौन सी नेअमत से इन्कार करोगे

لَمْ يَطْمِثْهُنَّ إِنسٌۭ قَبْلَهُمْ وَلَا جَآنٌّۭ ﴿٧٤﴾

74उनसे पहले उनको किसी इन्सान ने उनको छुआ तक नहीं और न जिन ने

فَبِأَىِّ ءَالَآءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ ﴿٧٥﴾

75फिर तुम दोनों अपने मालिक की किस किस नेअमत से मुकरोगे

مُتَّكِـِٔينَ عَلَىٰ رَفْرَفٍ خُضْرٍۢ وَعَبْقَرِىٍّ حِسَانٍۢ ﴿٧٦﴾

76ये लोग सब्ज़ कालीनों और नफीस व हसीन मसनदों पर तकिए लगाए (बैठे) होंगे

فَبِأَىِّ ءَالَآءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ ﴿٧٧﴾

77फिर तुम अपने परवरदिगार की किन किन नेअमतों से इन्कार करोगे

تَبَٰرَكَ ٱسْمُ رَبِّكَ ذِى ٱلْجَلَٰلِ وَٱلْإِكْرَامِ ﴿٧٨﴾

78(ऐ रसूल) तुम्हारा परवरदिगार जो साहिबे जलाल व करामत है उसी का नाम बड़ा बाबरकत है

क़ुरआन का पाठ: तंज़ील प्रोजेक्ट (tanzil.net), उस्मानी लिपि, हूबहू प्रति, CC BY 3.0। अनुवाद: सुहेल फ़ारूक़ ख़ान और सैफ़ुर्रहमान नदवी।

सूरह Ar-Rahman में कितनी आयतें हैं?

सूरह Ar-Rahman में 78 आयतें हैं।

सूरह Ar-Rahman मक्की है या मदनी?

सूरह Ar-Rahman मदनी सूरह है, मुसहफ़ के क्रम में 55वीं।

सूरह Ar-Rahman किस पारे में है?

सूरह Ar-Rahman पारा 27 में है, मदीना मुसहफ़ के पृष्ठ 531-534 पर।