सूरह Ad-Dukhan

سورة الدخان

क़ुरआन की 114 सूरतों में 44वीं, मक्की, 59 आयतें। उस्मानी लिपि में पूरा अरबी पाठ (हफ़्स अन आसिम) और हिंदी अनुवाद।

#44मक्की59 आयतें
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सूरह संख्या
44
आयतें
59
अवतरण
मक्की
पारा
25
मुसहफ़ के पृष्ठ
496-498

सुनें · Mishary Rashid Alafasy

بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَٰنِ ٱلرَّحِيمِ

حمٓ ﴿١﴾

1हा मीम

وَٱلْكِتَٰبِ ٱلْمُبِينِ ﴿٢﴾

2वाज़ेए व रौशन किताब (कुरान) की क़सम

إِنَّآ أَنزَلْنَٰهُ فِى لَيْلَةٍۢ مُّبَٰرَكَةٍ ۚ إِنَّا كُنَّا مُنذِرِينَ ﴿٣﴾

3हमने इसको मुबारक रात (शबे क़द्र) में नाज़िल किया बेशक हम (अज़ाब से) डराने वाले थे

فِيهَا يُفْرَقُ كُلُّ أَمْرٍ حَكِيمٍ ﴿٤﴾

4इसी रात को तमाम दुनिया के हिक़मत व मसलेहत के (साल भर के) काम फ़ैसले किये जाते हैं

أَمْرًۭا مِّنْ عِندِنَآ ۚ إِنَّا كُنَّا مُرْسِلِينَ ﴿٥﴾

5यानि हमारे यहाँ से हुक्म होकर (बेशक) हम ही (पैग़म्बरों के) भेजने वाले हैं

رَحْمَةًۭ مِّن رَّبِّكَ ۚ إِنَّهُۥ هُوَ ٱلسَّمِيعُ ٱلْعَلِيمُ ﴿٦﴾

6ये तुम्हारे परवरदिगार की मेहरबानी है, वह बेशक बड़ा सुनने वाला वाक़िफ़कार है

رَبِّ ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضِ وَمَا بَيْنَهُمَآ ۖ إِن كُنتُم مُّوقِنِينَ ﴿٧﴾

7सारे आसमान व ज़मीन और जो कुछ इन दोनों के दरमियान है सबका मालिक

لَآ إِلَٰهَ إِلَّا هُوَ يُحْىِۦ وَيُمِيتُ ۖ رَبُّكُمْ وَرَبُّ ءَابَآئِكُمُ ٱلْأَوَّلِينَ ﴿٨﴾

8अगर तुममें यक़ीन करने की सलाहियत है (तो करो) उसके सिवा कोई माबूद नहीं - वही जिलाता है वही मारता है तुम्हारा मालिक और तुम्हारे (अगले) बाप दादाओं का भी मालिक है

بَلْ هُمْ فِى شَكٍّۢ يَلْعَبُونَ ﴿٩﴾

9लेकिन ये लोग तो शक़ में पड़े खेल रहे हैं

فَٱرْتَقِبْ يَوْمَ تَأْتِى ٱلسَّمَآءُ بِدُخَانٍۢ مُّبِينٍۢ ﴿١٠﴾

10तो तुम उस दिन का इन्तेज़ार करो कि आसमान से ज़ाहिर ब ज़ाहिर धुऑं निकलेगा

يَغْشَى ٱلنَّاسَ ۖ هَٰذَا عَذَابٌ أَلِيمٌۭ ﴿١١﴾

11(और) लोगों को ढाँक लेगा ये दर्दनाक अज़ाब है

رَّبَّنَا ٱكْشِفْ عَنَّا ٱلْعَذَابَ إِنَّا مُؤْمِنُونَ ﴿١٢﴾

12कुफ्फ़ार भी घबराकर कहेंगे कि परवरदिगार हमसे अज़ाब को दूर दफ़ा कर दे हम भी ईमान लाते हैं

أَنَّىٰ لَهُمُ ٱلذِّكْرَىٰ وَقَدْ جَآءَهُمْ رَسُولٌۭ مُّبِينٌۭ ﴿١٣﴾

13(उस वक्त) भला क्या उनको नसीहत होगी जब उनके पास पैग़म्बर आ चुके जो साफ़ साफ़ बयान कर देते थे

ثُمَّ تَوَلَّوْا۟ عَنْهُ وَقَالُوا۟ مُعَلَّمٌۭ مَّجْنُونٌ ﴿١٤﴾

14इस पर भी उन लोगों ने उससे मुँह फेरा और कहने लगे ये तो (सिखाया) पढ़ाया हुआ दीवाना है

إِنَّا كَاشِفُوا۟ ٱلْعَذَابِ قَلِيلًا ۚ إِنَّكُمْ عَآئِدُونَ ﴿١٥﴾

15(अच्छा ख़ैर) हम थोड़े दिन के लिए अज़ाब को टाल देते हैं मगर हम जानते हैं तुम ज़रूर फिर कुफ्र करोगे

يَوْمَ نَبْطِشُ ٱلْبَطْشَةَ ٱلْكُبْرَىٰٓ إِنَّا مُنتَقِمُونَ ﴿١٦﴾

16हम बेशक (उनसे) पूरा बदला तो बस उस दिन लेगें जिस दिन सख्त पकड़ पकड़ेंगे

۞ وَلَقَدْ فَتَنَّا قَبْلَهُمْ قَوْمَ فِرْعَوْنَ وَجَآءَهُمْ رَسُولٌۭ كَرِيمٌ ﴿١٧﴾

17और उनसे पहले हमने क़ौमे फिरऔन की आज़माइश की और उनके पास एक आली क़दर पैग़म्बर (मूसा) आए

أَنْ أَدُّوٓا۟ إِلَىَّ عِبَادَ ٱللَّهِ ۖ إِنِّى لَكُمْ رَسُولٌ أَمِينٌۭ ﴿١٨﴾

18(और कहा) कि ख़ुदा के बन्दों (बनी इसराईल) को मेरे हवाले कर दो मैं (ख़ुदा की तरफ से) तुम्हारा एक अमानतदार पैग़म्बर हूँ

وَأَن لَّا تَعْلُوا۟ عَلَى ٱللَّهِ ۖ إِنِّىٓ ءَاتِيكُم بِسُلْطَٰنٍۢ مُّبِينٍۢ ﴿١٩﴾

19और ख़ुदा के सामने सरकशी न करो मैं तुम्हारे पास वाज़ेए व रौशन दलीलें ले कर आया हूँ

وَإِنِّى عُذْتُ بِرَبِّى وَرَبِّكُمْ أَن تَرْجُمُونِ ﴿٢٠﴾

20और इस बात से कि तुम मुझे संगसार करो मैं अपने और तुम्हारे परवरदिगार (ख़ुदा) की पनाह मांगता हूँ

وَإِن لَّمْ تُؤْمِنُوا۟ لِى فَٱعْتَزِلُونِ ﴿٢١﴾

21और अगर तुम मुझ पर ईमान नहीं लाए तो तुम मुझसे अलग हो जाओ

فَدَعَا رَبَّهُۥٓ أَنَّ هَٰٓؤُلَآءِ قَوْمٌۭ مُّجْرِمُونَ ﴿٢٢﴾

22(मगर वह सुनाने लगे) तब मूसा ने अपने परवरदिगार से दुआ की कि ये बड़े शरीर लोग हैं

فَأَسْرِ بِعِبَادِى لَيْلًا إِنَّكُم مُّتَّبَعُونَ ﴿٢٣﴾

23तो ख़ुदा ने हुक्म दिया कि तुम मेरे बन्दों (बनी इसराईल) को रातों रात लेकर चले जाओ और तुम्हारा पीछा भी ज़रूर किया जाएगा

وَٱتْرُكِ ٱلْبَحْرَ رَهْوًا ۖ إِنَّهُمْ جُندٌۭ مُّغْرَقُونَ ﴿٢٤﴾

24और दरिया को अपनी हालत पर ठहरा हुआ छोड़ कर (पार हो) जाओ (तुम्हारे बाद) उनका सारा लशकर डुबो दिया जाएगा

كَمْ تَرَكُوا۟ مِن جَنَّٰتٍۢ وَعُيُونٍۢ ﴿٢٥﴾

25वह लोग (ख़ुदा जाने) कितने बाग़ और चश्में और खेतियाँ

وَزُرُوعٍۢ وَمَقَامٍۢ كَرِيمٍۢ ﴿٢٦﴾

26और नफीस मकानात और आराम की चीज़ें

وَنَعْمَةٍۢ كَانُوا۟ فِيهَا فَٰكِهِينَ ﴿٢٧﴾

27जिनमें वह ऐश और चैन किया करते थे छोड़ गये यूँ ही हुआ

كَذَٰلِكَ ۖ وَأَوْرَثْنَٰهَا قَوْمًا ءَاخَرِينَ ﴿٢٨﴾

28और उन तमाम चीज़ों का दूसरे लोगों को मालिक बना दिया

فَمَا بَكَتْ عَلَيْهِمُ ٱلسَّمَآءُ وَٱلْأَرْضُ وَمَا كَانُوا۟ مُنظَرِينَ ﴿٢٩﴾

29तो उन लोगों पर आसमान व ज़मीन को भी रोना न आया और न उन्हें मोहलत ही दी गयी

وَلَقَدْ نَجَّيْنَا بَنِىٓ إِسْرَٰٓءِيلَ مِنَ ٱلْعَذَابِ ٱلْمُهِينِ ﴿٣٠﴾

30और हमने बनी इसराईल को ज़िल्लत के अज़ाब से फिरऔन (के पन्जे) से नजात दी

مِن فِرْعَوْنَ ۚ إِنَّهُۥ كَانَ عَالِيًۭا مِّنَ ٱلْمُسْرِفِينَ ﴿٣١﴾

31वह बेशक सरकश और हद से बाहर निकल गया था

وَلَقَدِ ٱخْتَرْنَٰهُمْ عَلَىٰ عِلْمٍ عَلَى ٱلْعَٰلَمِينَ ﴿٣٢﴾

32और हमने बनी इसराईल को समझ बूझ कर सारे जहॉन से बरगुज़ीदा किया था

وَءَاتَيْنَٰهُم مِّنَ ٱلْءَايَٰتِ مَا فِيهِ بَلَٰٓؤٌۭا۟ مُّبِينٌ ﴿٣٣﴾

33और हमने उनको ऐसी निशानियाँ दी थीं जिनमें (उनकी) सरीही आज़माइश थी

إِنَّ هَٰٓؤُلَآءِ لَيَقُولُونَ ﴿٣٤﴾

34ये (कुफ्फ़ारे मक्का) (मुसलमानों से) कहते हैं

إِنْ هِىَ إِلَّا مَوْتَتُنَا ٱلْأُولَىٰ وَمَا نَحْنُ بِمُنشَرِينَ ﴿٣٥﴾

35कि हमें तो सिर्फ एक बार मरना है और फिर हम दोबारा (ज़िन्दा करके) उठाए न जाएँगे

فَأْتُوا۟ بِـَٔابَآئِنَآ إِن كُنتُمْ صَٰدِقِينَ ﴿٣٦﴾

36तो अगर तुम सच्चे हो तो हमारे बाप दादाओं को (ज़िन्दा करके) ले आओ

أَهُمْ خَيْرٌ أَمْ قَوْمُ تُبَّعٍۢ وَٱلَّذِينَ مِن قَبْلِهِمْ ۚ أَهْلَكْنَٰهُمْ ۖ إِنَّهُمْ كَانُوا۟ مُجْرِمِينَ ﴿٣٧﴾

37भला ये लोग (क़ूवत में) अच्छे हैं या तुब्बा की क़ौम और वह लोग जो उनसे पहले हो चुके हमने उन सबको हलाक कर दिया (क्योंकि) वह ज़रूर गुनाहगार थे

وَمَا خَلَقْنَا ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضَ وَمَا بَيْنَهُمَا لَٰعِبِينَ ﴿٣٨﴾

38और हमने सारे आसमान व ज़मीन और जो चीज़े उन दोनों के दरमियान में हैं उनको खेलते हुए नहीं बनाया

مَا خَلَقْنَٰهُمَآ إِلَّا بِٱلْحَقِّ وَلَٰكِنَّ أَكْثَرَهُمْ لَا يَعْلَمُونَ ﴿٣٩﴾

39इन दोनों को हमने बस ठीक (मसलहत से) पैदा किया मगर उनमें के बहुतेरे लोग नहीं जानते

إِنَّ يَوْمَ ٱلْفَصْلِ مِيقَٰتُهُمْ أَجْمَعِينَ ﴿٤٠﴾

40बेशक फ़ैसला (क़यामत) का दिन उन सब (के दोबार ज़िन्दा होने) का मुक़र्रर वक्त है

يَوْمَ لَا يُغْنِى مَوْلًى عَن مَّوْلًۭى شَيْـًۭٔا وَلَا هُمْ يُنصَرُونَ ﴿٤١﴾

41जिस दिन कोई दोस्त किसी दोस्त के कुछ काम न आएगा और न उन की मदद की जाएगी

إِلَّا مَن رَّحِمَ ٱللَّهُ ۚ إِنَّهُۥ هُوَ ٱلْعَزِيزُ ٱلرَّحِيمُ ﴿٤٢﴾

42मगर जिन पर ख़ुदा रहम फरमाए बेशक वह (ख़ुदा) सब पर ग़ालिब बड़ा रहम करने वाला है

إِنَّ شَجَرَتَ ٱلزَّقُّومِ ﴿٤٣﴾

43(आख़ेरत में) थोहड़ का दरख्त

طَعَامُ ٱلْأَثِيمِ ﴿٤٤﴾

44ज़रूर गुनेहगार का खाना होगा

كَٱلْمُهْلِ يَغْلِى فِى ٱلْبُطُونِ ﴿٤٥﴾

45जैसे पिघला हुआ तांबा वह पेटों में इस तरह उबाल खाएगा

كَغَلْىِ ٱلْحَمِيمِ ﴿٤٦﴾

46जैसे खौलता हुआ पानी उबाल खाता है

خُذُوهُ فَٱعْتِلُوهُ إِلَىٰ سَوَآءِ ٱلْجَحِيمِ ﴿٤٧﴾

47(फरिश्तों को हुक्म होगा) इसको पकड़ो और घसीटते हुए दोज़ख़ के बीचों बीच में ले जाओ

ثُمَّ صُبُّوا۟ فَوْقَ رَأْسِهِۦ مِنْ عَذَابِ ٱلْحَمِيمِ ﴿٤٨﴾

48फिर उसके सर पर खौलते हुए पानी का अज़ाब डालो फिर उससे ताआनन कहा जाएगा अब मज़ा चखो

ذُقْ إِنَّكَ أَنتَ ٱلْعَزِيزُ ٱلْكَرِيمُ ﴿٤٩﴾

49बेशक तू तो बड़ा इज्ज़त वाला सरदार है

إِنَّ هَٰذَا مَا كُنتُم بِهِۦ تَمْتَرُونَ ﴿٥٠﴾

50ये वही दोज़ख़ तो है जिसमें तुम लोग शक़ किया करते थे

إِنَّ ٱلْمُتَّقِينَ فِى مَقَامٍ أَمِينٍۢ ﴿٥١﴾

51बेशक परहेज़गार लोग अमन की जगह

فِى جَنَّٰتٍۢ وَعُيُونٍۢ ﴿٥٢﴾

52(यानि) बाग़ों और चश्मों में होंगे

يَلْبَسُونَ مِن سُندُسٍۢ وَإِسْتَبْرَقٍۢ مُّتَقَٰبِلِينَ ﴿٥٣﴾

53रेशम की कभी बारीक़ और कभी दबीज़ पोशाकें पहने हुए एक दूसरे के आमने सामने बैठे होंगे

كَذَٰلِكَ وَزَوَّجْنَٰهُم بِحُورٍ عِينٍۢ ﴿٥٤﴾

54ऐसा ही होगा और हम बड़ी बड़ी ऑंखों वाली हूरों से उनके जोड़े लगा देंगे

يَدْعُونَ فِيهَا بِكُلِّ فَٰكِهَةٍ ءَامِنِينَ ﴿٥٥﴾

55वहाँ इत्मेनान से हर किस्म के मेवे मंगवा कर खायेंगे

لَا يَذُوقُونَ فِيهَا ٱلْمَوْتَ إِلَّا ٱلْمَوْتَةَ ٱلْأُولَىٰ ۖ وَوَقَىٰهُمْ عَذَابَ ٱلْجَحِيمِ ﴿٥٦﴾

56वहाँ पहली दफ़ा की मौत के सिवा उनको मौत की तलख़ी चख़नी ही न पड़ेगी और ख़ुदा उनको दोज़ख़ के अज़ाब से महफूज़ रखेगा

فَضْلًۭا مِّن رَّبِّكَ ۚ ذَٰلِكَ هُوَ ٱلْفَوْزُ ٱلْعَظِيمُ ﴿٥٧﴾

57(ये) तुम्हारे परवरदिगार का फज़ल है यही तो बड़ी कामयाबी है

فَإِنَّمَا يَسَّرْنَٰهُ بِلِسَانِكَ لَعَلَّهُمْ يَتَذَكَّرُونَ ﴿٥٨﴾

58तो हमने इस क़ुरान को तुम्हारी ज़बान में (इसलिए) आसान कर दिया है ताकि ये लोग नसीहत पकड़ें तो

فَٱرْتَقِبْ إِنَّهُم مُّرْتَقِبُونَ ﴿٥٩﴾

59(नतीजे के) तुम भी मुन्तज़िर रहो ये लोग भी मुन्तज़िर हैं

क़ुरआन का पाठ: तंज़ील प्रोजेक्ट (tanzil.net), उस्मानी लिपि, हूबहू प्रति, CC BY 3.0। अनुवाद: सुहेल फ़ारूक़ ख़ान और सैफ़ुर्रहमान नदवी।

सूरह Ad-Dukhan में कितनी आयतें हैं?

सूरह Ad-Dukhan में 59 आयतें हैं।

सूरह Ad-Dukhan मक्की है या मदनी?

सूरह Ad-Dukhan मक्की सूरह है, मुसहफ़ के क्रम में 44वीं।

सूरह Ad-Dukhan किस पारे में है?

सूरह Ad-Dukhan पारा 25 में है, मदीना मुसहफ़ के पृष्ठ 496-498 पर।